संवाददाता समाचार टाउन
कायमगंज राष्ट्र गीत वंदे मातरम के १५० वर्ष पूरे होने पर राष्ट्रीय प्रगतिशील फोरम द्वारा आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्ष प्रो० रामबाबू मिश्र रत्नेश ने कहा कि वंदे मातरम भारत की आत्मा का संगीत है,बलिदानों की परंपरा का गौरव गान है।राष्ट्र के प्रति अखंड आस्था व गैर समझौतावादी समर्पण का महामंत्र है। सियासी दबाव के कारण १९३७ में इस गीत के दो टुकड़े किए गए और दस वर्ष बाद देश के भी दो टुकड़े हो गए।

शिक्षक शिव कुमार दुबे ने कहा कि इस राष्ट्रगीत को सांप्रदायिक रंग देना आत्मघाती है। राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान राष्ट्र द्रोह है। युवा कवि अनुपम मिश्र ने कहा कि आज देश आंतरिक एवं बाहरी प्रहार झेल रहा है। आतंक की जड़ पर प्रहार करना समय की मांग है। प्रधानाचार्य शिवकांत शुक्ल व पूर्व प्रधानाचार्य अहिवरन सिंह गौर ने कहा कि आतंककारी घटनाओं में शामिल तत्वों को त्वरित न्यायिक परीक्षण के तहत प्राणदंड देने की व्यवस्था होनी चाहिए।
सत्यम दुबे व यशवर्धन ने कहा कि वंदे मातरम गीत का विरोध कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने किया था बाद में मौलाना मुहम्मद अली ने एतराज किया। इसके बावजूद विष्णु दिगंबर पलुस्कर व टैगोर की भतीजी सरला देवी ने पूरा गीत गाया। इससे जन जागृति का मार्ग प्रशस्त्र हुआ।

