संवाददाता समाचार टाउन
कायमगंज। शिक्षा और उन्माद के इस दौर में संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद विश्व शांति के लिए एकमात्र सर्वमान्य माध्यम है। अपनी निरंतर बढ़ती आर्थिकी और सैन्य शक्ति से चीन विश्व व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अमेरिका की अनिश्चयवादी राजनीति व रूस की युद्धप्रियता से यह खतरा और बढ़ जाता है। भारत की राष्ट्रनीति, कूटनीति व विदेशनीति की जटिल परीक्षा से गुज़र रही है।
राष्ट्रीय प्रगतिशील फोरम द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस पर आयोजित गोष्ठी में प्रो० रामबाबू मिश्र रत्नेश ने कहा कि यू० एन० ओ० की स्थापना मानवता को जन्नत नसीब कराने के लिए नहीं बल्कि दुनिया को जहन्नुम से बचाने के लिए हुई थी। लीग ऑफ नेशन्स की नाकामी के बाद विश्व शांति के लिए यू० एन० ओ० की स्थापना की गई थी।

लेकिन यह विश्व संस्था न तो आज तक कोई युद्ध रोक पाई और न विश्व शांति के लिए कोई योगदान कर पाई है।इसकी असफलता के पीछे अमेरिका पर वित्तीय निर्भरता और पांच राष्ट्रों के पास वीटो पावर का होना भी है जिसे वे निजी स्वार्थ के लिए प्रयोग भी करते हैं।
पूर्व प्रधानाचार्य अहिवरन सिंह गौर और आचार्य शिवकांत शुक्ला,शिक्षक अनुपम मिश्रा ने कहा कि यू० एन० ओ०विश्व शांति का अलंबरदार ही नहीं मानवाधिकारों का सक्षम पहरेदार भी है। अनेक मोर्चों पर असफल रहने के बाद भी आण्विक हथियारों के महाविनाशकारी ज्वालामुखियों पर खड़ी दुनिया को बचाने का यही एकमात्र सर्वस्वीकृत माध्यम है।
गोष्ठी में जे०पी० दुबे, वी० एस० तिवारी,शिव कुमार दुबे, पवन बाथम,डॉ सुनीत सिद्धार्थ आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

